Friday, 8 March 2019

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की सुभकामनाएँ

बस इतना हमें रखना है ध्यान
कि न करें कभी किसी का अपमान
हर महिला को मिले सम्मान C
और हर नारी पर हो अभिमान

समस्त नारी शक्ति को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की सुभकामनाएँ

© Vinod Jethuri 8 March, 2019

Wednesday, 2 January 2019

नम आखोँ से दादी जी को अलविदा और भावभिनी श्रधाँजली

दादी जी का जन्म अनुमानित सन 1919 से 1921 के मध्य हुआ था और लगभग 100 साल की उम्र मे आज दिनाँक 01/01/2019 को रात्री के 10 बजे दादी जी ने अंतिम साँस ली । दादी जी को अश्रुपुर्ण श्रधाँजली और परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को अपने चरणो मे स्थान दे यही हम प्रार्थना करते है ।
दादी जी का जन्म उस समय हुुआ जब भारत के इतिहास मे पहली बार सूखे और गरीबी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौते हुई थी और भारत की अवादी घटने लगी थी । दादी जी उस जमाने की बाते बतायी करती थी थी कि किस तरह से एक वक्त की रोटी के लिए कठिन परिश्रम करना पडता था । मात्र 13 साल की उम्र मे दादी जी की शादी हो गयी थी और तत्पश्चात 13 बच्चोँ का जन्म और उनका भरण - पोषण करना कितना मुस्किल था यह दादी हमे बताती थी ।

दादी जी बताती थी कि वार्टर सिस्टम के तहत खाने की वस्तुओँ का आदान प्रदान होता था लेकिन नमक और ग़ुड के लिए "ढाकर" ऋषिकेश तक जाना पडता था क्योंकि नमक और चीनी पहाडोँ मे नही होता था । "ढाकर" के लिए लिए गाँव के आदमियोँ का एक समूह गाँव से ऋषिकेश के लिए निकलते थे और जगल के पैदल रास्तो से होकर 1 महिने बाद गुड और नमक ले कर आते थे । उस समय गाँव मे सडक की ब्यव्स्था नही थी इसलिए पैदल रास्ते से होकर जाना पडता था, माळू की टांटियोँ के चप्पल बनाये जाते थे और रास्ते मे रुककर जँगलोँ से कंदमुल फलोँ को भुनकर खाते थे साथ ही पत्त्थरो को गर्म करके उनमे रोटियाँ बनायी जाती थी और जब 1 महिने बाद ढाकरी गाँव पहुँचते थे तो उनके पैरोँ मे बडे बडे छाले होते थे । 

दादी बताती थि कि गाँव मे घी, अनाज एत्यादि लेकर राजा के यहाँ कर के रुप मे उसे पहुँचाते थे, एक गाँव वाले दुसरे गाँव तक और दुसरे गाँव वाले वहा से आगे राजा के दरबार तक यह सामान पहुँचाते थे ।
खाने के लिए जब कुछ नही होता था तो पिन्ना (तिल से तेल निकालने के बाद जो रौ मटिरियल बचता है पिन्ना कहलाता है) खाया करते थे साथ ही गेँठी, तैड, और बसिगुँ उबालने के बाद उसे खा कर पेट की भुख मिटाते थे, बरतन न होने के कारण परिवार मे 13 बच्चे एक ही परात (बडी सी थाली) मे खाना खाते थे, मेरे दादा जी बच्चोँ को खिलाने के लिए सिर्फ परात मे हाथ रखते थे लेकिन खाना नही खाते थे क्योंकि वह बस बच्चोँ का पेट भरना चाहते थे । 

मेरा दादी जी से अधिक लगाव रहा है जब भी समय मिलता था दादी जी के साथ मे बैठ जाता था और उस जमाने की बाते पुछा करता था, दादी जी को भी अपने दिनो की यादोँ को साझा करने मे अच्छा लगता था । मैंने महसुस किया है कि यदि हम बुजुर्गोँ के साथ बैठ कर थोडा बहुत उनके साथ बातेँ करे तो उन्हे बहुत अछा लगता है ।
आज दादी जी भले ही वैकुँठ धाम पधार गये है लेकिन आपके द्वारा दी गयी शिक्षा, जानकारियाँ और आपकी यादेँ सदा हमारे साथ रहेगी जो कि मैंने कुछ जानकारियाँ लिख कर सग्रँह कर लिए है और कुछ अपने मस्तिष्क मे याद कर ली है जो के हमेशा मेरे साथ रहेगी ।
दादी जी को एक बार पुँन भावभिनी श्रधाँजली
आपकी यादेँ सदा हमारे दिलोँ मे रहेगी ।
अलविदा दादी जी ॥

Wednesday, 25 July 2018

जातिगत आरक्षण एक अभिशाप

मराठा आंदोलन, जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन और न जाने कितने येसे आंदोलन है जो एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि समाज में कुछ सर्व संपन्न लोग आरक्षण के नाम दिन प्रतिदिन आंदोलन करते रहते हैं और राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुँचाने के साथ साथ दुसरे लोँगो को कष्ट पहुँचाते है । 
यदि योँ ही चलता रहा तो वह दिन दुर नही जब पुरे देश के हर एक कोने से आरक्षण आरक्षण की आवाजेँ सुनाई देगी । अधिकतर देखने में आया है यह वह समुदाय है जो उस राज्य मे सबसे समृद्ध समुदायों में से एक माने जाते है । आज आवश्यक्ता है कि आरक्षण के विरोध मे पुरे देश मे आंदोलन किया जाय और और माँगे यह हो कि 
“जातिगत आरक्षण को खत्म करो और
आर्थिक स्तिथी के अनुरुप आरक्षण हो”

भारतीय संविधान मे इस उद्देश्य से आरक्षण का प्रावधान बनाया गया था कि समाज के कमजोर वर्गों में शैक्षणिक और आर्थिक हितों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का विशेष ध्‍यान रखा जाय और उन्‍हें सामाजिक अन्‍याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखा जाय जिसमे 1950 में 10 साल (1960 तक) तक SC के लिए 15%, ST के लिए 7.5% आरक्षण की बात कही गई थी। धीरे-धीरे इसे खत्म करने की बजाय इसमें और इजाफा होते जा रहा है और आज स्तिथी यह है पिछले 65 साल में मदद का यह रवैया न केवल बढ़ता गया है बल्कि इसका दायरा और स्तर भी इतना बढ़ चुका है, जितना कि हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक न की होगी। जब तक कोई आरक्षण को खत्म करने की बात करते है तब तक कोई दुसरा समूदाय आरक्षण के लिए आंदोलन शुरु कर देता है । 
आज स्थिति यह है कि हर किसी को आरक्षण चाहिए किसी को भी मेहनत नहीं करनी है बस फ्री की आदत पड गयी है और देखा देखी एक दुसरे लोग भी इनका अनुसरण करने लगे है लेकिन इस आरक्षण रूपी अभिशाप से बहुत से प्रतिभावान लोग पिछे रह जाते है । 
देश के उन समुदायों को जो आये दिन आरक्षण के नाम पर आंदोलन करते रहते हैं को उत्तराखंड जैसे राज्य और उनके लोगों से जो पहाडी राज्य के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में विषम परिस्तिथियोँ मे रहते है जँहा पर न तो उस स्तर की शैक्षणिक सुविधायेँ उपलब्ध होती और न ही आर्थिक स्तिथी मजबूत है लेकिन बाबजूद इसके कभी भी  आरक्षण की माँग नही कि जबकी सच्चे अर्थो मे उन्हे आरक्षण की कितनी आवश्यक्ता है यह हर कोई समझ सकता है । 
पहाडी लोग स्वभाव से मेहनती और स्वावलंबी होते हैं और दुसरो से फ्री की मिली हुई चिजो से बेहतर मेहनत और हुनर मे विश्वास रखते है | आज देश मे आवश्यक्ता है कि हम सब मिलकर जातिगत आरक्षण के खिलाफ आवाज उठायेँ और इस आरक्षण रुपी अभिशाप को देश ने निकाल फेँके और उन लोगोँ के हितो के लिए कार्य करेँ जिन्हे सच मे आरक्षण की आवश्यक्ता है । 

धन्यवाद ! 
विनोद जेठुड़ी

Thursday, 27 July 2017

इतिहास गवाह है कि जब जब पुत्र मोह जागी है तब तब सत्ता भागी है


  • लालू का पुत्र मोह विहार ले डुबा
  • मुलायम का पुत्र मोह उत्तर प्रदेश ले डुबा
  • कैकई का पुत्र मोह जशरथ की जान ले गया 
  • धृष्टराष्ट्र का पुत्र मोह महाभारत जैसे युद्द करवा बैठा
  • राजमाता शिवागामी का पुत्र मोह महिस्पति राजसिंहासन ले डुबा
  • गुरु द्रौण का पुत्र मोह के कारण अश्वत्थामा आज भी प्रथ्वी पर भटक रहा है 
  • और सोनिया गाँधी के पुत्र मोह  के कारण काग्रेस मुक्त भारत का निर्माण हो रहा है 
                                        विनोद जेठुड़ी  

Tuesday, 25 July 2017

अमर शहिद श्री देव सुमन को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि एँव श्रद्धा सुमन अर्पित



जब पुरा देश गुँज रहा था, आजादी के नारोँ से
तब टिहरी रियासत तडप रही थी
, राजा के अत्याचारोँ से
कोई नही बच पाता था इन, “कर” लेने आये साहूकारोँ से 
तब जा के एक "श्री देव" आया था, लडने इन अंधियारोँ से

दयालु हर्दय के कारण आप "सुमन" कहलाये थे 
अत्याचारोँ के खिलाफ, सदा आवाज उठाते थे
आजादी की लडाई मे भी सबसे आगे रहते थे
साहित्य, सम्पादन और सम्मेलन से सदा जुडे रहते थे

बँमुँड पट्टी के जौळ गाँव के आप मूल निवासी थे
हरिराम और तारा देवी के तीसरे लाडले बेटे थे
गायत्री बहन और परशुराम, कमलनयन दो भाई थे
विनय लक्ष्मी जैसी पत्नि का, हर पल साथ पाते थे

कुनैन के नसातंर्गत इंजेक्शन तुम्हे लगाये जाते थे
जिससे तुम पानी पानी चिल्लाते रहते थे
मोहन सिँह जेलर की यातनाये, बहुत तूम सहा करते थे
पत्थर पीस कर रोटी बनाते, फिर तूम्हे खिलाते थे

जानवरोँ जैसा ब्यव्हार, “सुमन”  आपसे किया करते थे
सजा दिलाने के लिए,  झूठे आरोप बनाते थे
209 दिनो तक मुजरिम बनकर, कारावास मे विताये थे
फिर 84 दिनो के अनशन मे अपनी जान गवायेँ थे

25 जुलाई 1944 को सुमन आपने प्राण त्याग दिये
बोरी मे बाँधकर आपके शरीर को, भिलंगना मे बहा दिये
जन अधिकारोँ की लडाई मे आप अमर शहिद हो गये
राजा की नौकरशाही से जनता को आजाद करा गये 

मैँ अपने शरीर के कँण - कँण को नष्ठ हो जाने दुँगा

लेकिन नागरिकोँ के अधिकारोँ का शोषण नही होने दुँगा
निर्ममता और तानाशाही के खिलाफ आपके नारे थे
दृढ इच्छा, दृढ़ शक्ति, दृढ़ आपके इरादे थे 

अमर शहीद के बलिदान दिवस पर, पुष्पांजली अर्पित करता हूँ 
जन्म दिया जिस मां ने तुमको, उसको प्रणाम करता हूँ 
जौल गाँव की उस मिट्टी से मै तिलक लगाता हूँ 
नम आंखों से भावभिनी श्रन्धांजली अर्पित करता हूँ 

© विनोद जेठुड़ी 

Monday, 17 July 2017

जिम्मेदारियां


सुबह सुबह उठ कर निकल जाता हूँ
अपनी राह पर .......
शाम होते ही पहुँचता हूँ
अपने ठिकाने पर
अंधेरा मे जाता हूँ
अंदेरा मे आता हूँ
अंधेरे मे ही परिवार से
फोन पर बात कर लेता हूँ

जिम्मेदारियोँ को निभाने निभाते
जिम्मेदार बन गया हूँ
इसी जिम्मेदारी के खातिर
यँहा परदेश आया हूँ ।
जब आया था, तो सोचा
बस, 3 साल की बात है
लेकिन आज 13 साल हो गये
वापस जाने की हिम्मत
न जुटा पा रहा हूँ ॥

कभी कभी तो सोचता हूँ कि
छोड छाड के के चले आता हूँ  
अपने देश मे ......
फिर “जिम्मेदारियाँ” कहती है....
क्या कमा पाओगे इतना पैसा वहाँ ?
जितना है इस परदेश मे ॥

वतन की जब कोई तसवीर
फेसबूक पर देखने को मिलती है  
सच बोलूँ यार, उसी वक्त
बतन की बहुत याद आती है ।
शादी, ब्याह और त्योहारोँ मे
जब परिवार की फोटो आती है
देख देख कर मन भाऊक हो जाता है  
और आंखे भर आती है 

© विनोद जेठुड़ी 

Thursday, 13 July 2017

प्रकृति का दर्द

अपने आशियानो को जलाकर भी
घर तुम्हारा रोशन किया हमने ।
कर्ज कैसे अदा करोगे हमारा ?
जब फर्ज ही भुला दिया तुमने ॥
                          "Pain of Nature"
+Vinod Jethuri

शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ - 2022

 शिक्षा का दान करने वाले महान होते हैँ ।  शिक्षक के रुप मे वह, भगवान होते हैँ ॥  शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ