Friday, 19 July 2013

भारतीय सँस्क्रति इन युनिवर्सिटी औफ सिनसिनाटी

भारतीय संस्कृति विश्व की सबसे प्राचीन संस्कृति मे से एक है, भारतवर्ष की बोली भाषा, भारतवर्ष के लोग, भारतवर्ष की संस्कृति भारतवर्ष का साहित्य और भारतवर्ष का इतिहास के बारे मे विस्तार से जानने के लिये दुनियाभर से लोग यहां आते है और हमारी संस्कृति को और अधिक जानने मे रुची रखते है। हमारी संस्कृति मे ईतनी सुन्दरता व मिठास है कि शायद ही दुनिँया की किसी भी देश की संस्कृति मे हो, इसी का नतिजा है कि युनिवर्सिटी औफ सिनसिनाटी यू.एस.ए मे भारतीय लोक सँगीत व बाध्य यँत्रोँ पर रिसर्च किया जा रहा है ।भारतवर्ष के हिमालयी क्षेत्र मे स्तिथ देवभूमी उत्तराखँड राज्य की संस्कृति से युनिवर्सिटी औफ सिनसिनाटी यू.एस.ए के प्रोफेसर स्टेफन फ़िओल इतने प्रभावित हुये कि यँहा के प्रसिध लोक गायक, जागर सम्राट, ढोल वादक श्री प्रीतम भरतवाण जी को यू.एस.ए ले गये और वँहा के लोकल लोगो द्धारा प्रितम जी के निर्देशन मे एक शो प्रस्तुत किया ।

आप सभी लोग भी ये वीडियो जरुर देखेँ, आपको एक भारतीय व उत्तराखँडी होने पर गर्व होगा ।


धन्यवाद !



Saturday, 22 June 2013

एक आपदा पिडित की आपबीति

उत्तराखँड मे 15, 16 और 17 जून 2013 को आयी प्रलय से हजारो लोगो की जान चले गयी हजारो लोग अभी तक भी लापता है और न जाने कितने लोग अभी भी फँसे हुये है । भगवान से प्रार्थना करते है कि जो लोग अभी भी इस आपदा मे फँसे हुये है उनकी मदद करे और म्रतको की आत्मा को शांति प्रदान करे । एक आपदा पिडित अपनी दर्द भरी दास्ता निचे लिखी पक्तिँयो के माध्यम से सुना रहा है । 

मै चले जा रहा था, बढे जा रहा था
खुबसुरत वादियाँ घनघोर घटायें ..
मंद वेग से बहती हवायें
कल-कल छ्ल-छ्ल करती गंगा
विराजती है जँहा माँ नन्दा
पल भर की थी ये अनुभूती
देवभूमी कहते जिसको
प्रलय भूमी बन चुकी थी ।
प्रलय के प्रतिक है बाबा
शिव-शंभू तेरे द्वार पे आया
आखों देखी जो कुछ देखा
हे प्रभू ओ कभी ना सोचा !
प्रलय का उफ़्फ़ ओ मंजर
पर्वत ढह गये, बने समुंदर
आहाकार की चीख पुकारें
पानी मे बहती लासें
कुछ तो जिंदे दफ़न हुये थे
तडप-तडप के मर रहे थे
सडक और घर सब कुछ ढह गये
नदी मे तिनके जैसे बह गये
पांच दिनो तक दबा हुआ था
लासों के बीच मे पडा हुआ था
मलवे मे मेरा पैर फ़ंसा था
मेरे अपने सारे बह गये..
नम आखों से अलविदा कह गये
मुझको जिँदा क्योँ रख दिया तूने
मुझको भी तो मार ही देता
जिँदा रह कर क्या करुँगा
कैँसे जिँदा रह पाउँगा ? - 4 

Friday, 21 June 2013

उत्तराखँड मे पराक्रतिक आपदा


ये क्या प्रक्रति का आक्रोश
या देवताऑ का प्रकोप ?
हुआ कलयुग का अगमन
कि पर्वत हुये जलमग्न ।
ना सोचा था न सोचेँगे
ना देखा था ना देखेँगे
तेरा ये विकराल रुप...!

अपने ही कर्मो कि...
मिली क्या सजा हमको ?

गल्ति येसी क्या हुयी जो हमसे
अपने ही दर पे जो बिछा दी लासेँ
कुछ की तो अभी चलती है साँसे
पर निकलेँ तो कैसे दबी है बाहेँ
ये एक चेतावनी प्रक्रति की
ना खेलो मुझसे जादा
खेलोगो तो योँ ही प्रलाय
आता रहेगा आता रहेगा ॥

शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ - 2022

 शिक्षा का दान करने वाले महान होते हैँ ।  शिक्षक के रुप मे वह, भगवान होते हैँ ॥  शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ