Thursday, 10 December 2015

विश्व मानव अधिकार दिवस की सुभकामनायेँ

किसानोँ की तो उम्र गुजर गयी
कर्ज देते सौकारोँ की............।  
बात बडी बडी करते हो जी
मानवता के अधिकारोँ की ॥

क्या कभी गुँज सुनाई दी... ?
बम और गोली के धमाकोँ की  
बात करने से क्या फायदा
मानवता के अधिकारोँ की

अपने को ही उडा देता कोई
भीड मे जाके हजारोँ की
उन्ही का मुखिया बात करता फिर्
मानवता के अधिकारोँ की

कहाँ गयी दया भाव इन
ईंसानियत के ईंसानो की
बात करने से कुछ नही होता
मानवता के अधिकारोँ की

अकेले चलने मे डर लगता है
स्तिथी ये है महिलाओँ की
कँहा गयी ओ स्वतंत्रता हमारी
मानवता के अधिकारोँ की

बिन खाये ही सो जाते कुछ
चादर नही सर ढकने की
बात बडी बडी करते हो जी
मानवता के अधिकारोँ की

कोई अपनी जान गँवाता  
क्योँकि इच्छा थी कुछ खाने की
ये भी कैसी शोषणता है ?
मानवता के अधिकारोँ की

स्वास्थ्य, शिक्षा, विजली, पानी
अभाव है बुनियादी चीजो की
आस लगाये बैठेँ है जी ..
अपने इन अधिकारोँ की

देश मे बढती गाडियोँ से...
प्रदुशित हवा हुयी, शहरोँ की
अमिरोँ को जो शौक है लगता
शोषण गरिबोँ के अधिकारोँ की  

घर मे ही जो कैदी बन गयी  
ब्यथा सुनो उस नारी की
मुझको भी दो हक जीने का
मानवता के अधिकारोँ की

मानवता मेरा पहला धर्म है
धार्मिक पुस्तक है सतकर्मो की
आओ मिलकर आवाज उठायेँ
मानवता के अधिकारोँ की

सहयोग करेँ सब मिलकर के  
उन, जरुरत मँद ईसाँनो की
समानता से पालन हो
मानवता के अधिकारोँ की

विनोद् जेठुडी
10 दिसम्बर, 2015
(विश्व मानवता दिवस पर विशेष)