Friday, 16 September 2022

शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ - 2022

 शिक्षा का दान करने वाले महान होते हैँ । 

शिक्षक के रुप मे वह, भगवान होते हैँ ॥ 


शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ

Sunday, 5 September 2021

शिक्षक दिवस की हार्दिक सुभकामनाएँ

अज्ञानता से ज्ञान की ओर, ले जाने वाला ध्योतक
पथ पर्दर्शक, मार्ग दर्शक, हम सब के सुभचिंतक
माता-पिता और भगवान जैसेँ पुज्यनीय हैँ वह शिक्षक
येसे समस्त गुरुजनो को करते प्रणाम होके नत मस्तक 

शिक्षक दिवस की हार्दिक सुभकामनाएँ । 

© 
विनोद जेठुडी, 05/09/2021, 8:30 a.m. 

Tuesday, 27 April 2021

हे परमपिता परमात्मा हमारी प्रार्थना स्वीकार करेँ

सभी की कुशलता के लिए भगवान से #प्रार्थना करते हैँ 🙏

हे परम पिता परमेश्वर हम सच्ची श्रद्धा तथा विश्वास से आपका स्मरण करते हैँ, जाने अनजाने मे हमसे यदि कोइ भुल हो गयी हो तो हमेँ माफ करना । इस कोरोना रुपी भयावह राक्षस पर विजय पाने के लिए हे प्रभु हम आपका स्मरण करते हैँ और आपकी शरण मे आए हैँ । आप मानव जाती का कल्याण करेँ और इस कोरोना रुपी राक्षस का इस प्रथ्वी से नाश करेँ ।
हे प्रभु आप बीमार-बेबस, दीन-दुखियॉ और निर्बल–असहायोँ पर अपनी क्रिपा द्रष्टी बनायेँ रखेँ । हम सच्ची निश्ठा सच्ची श्रधा, और सच्चे मन से आपका स्मरण करते हैँ आप अपना आशिर्वाद प्रदान कर हमे कृतार्थ करें।
हे परमपिता परमात्मा हमारी प्रार्थना स्वीकार करेँ और मानव जाती का कल्याण करेँ ।

Thursday, 10 December 2020

न सोचा था कभी कि, येसा भी दिन आयेगा

 


न सोचा था कभी कि, येसा भी दिन आयेगा
कोरोना नाम की बिमारी, ईतना हाहाकार मचायेगा
जो जहाँ फँस गया है, वहीँ फँसा रह जायेगा
अपनो से नजदीक रहकर भी अपनो से न मिल पायेगा
 
अपने ही घर मे जब कोई, महिनो बाद आएगा
जिसको देखो घर मे उसका, मुँह ढका ही पाएगा
हाथ मिलाना गले लगाना, किसी से न कर पायेगा
दुर से ही हाथ हिलाकर, १४ दिन का वनवास चले जायेगा
न सोचा था कभी कि ..........
कोरोना नाम की बिमारी ........
 
माँ बाप के मर जाने पर बेटा, मुखाग्नि न दे पायेगा
पंडित जी फोन पर ही, अंतिम सँस्कार करवायेगा
करुणामय हर्दय की पीडा सिर्फ वही समझ पायेगा
जिसने खोया अपनो को और उनसे कभी न मिल पायेगा
न सोचा था कभी कि ..........
कोरोना नाम की बिमारी ........
 
घाडी, घोडा, ट्रेन, जहाजेँ सब बंद हो जायेगा
पैँसे वालोँ का पैँसा भी कुछ काम न कर पायेगा
मजदूर तो बेबस है बेचारा, पैदल ही निकल जायेगा
कोई पहुँचेंगा घर को अपने, कोई भुखा प्यासा ही मर जायेगा
न सोचा था कभी कि ..........
कोरोना नाम की बिमारी ........
 
इस महामारी से लडने को कुछ कोरोना योधा बन जायेंगेँ
मानवता की सेवा को अपनी, जान न्यौछावर कर जायेंगे
रोते बिलखते अपने बच्चोँ को वह महोनोँ तक न मिल पायेंगे
येसा कोरोना योधाओँ का, हर कोई गुणगान गायेंगेँ
न सोचा था कभी कि ..........
कोरोना नाम की बिमारी ........
 
पीडा, दुख, दर्द का यह अशुभ समय टल जायेगा
सुख शांति और सौहार्द का सुभ समय फिर आयेगा
बैज्ञनिकोँ की शोध बहुत जल्द गुल खिलायेगा  
कि इस महामारी की दवाई बहुत जल्दी बन जायेगा
न सोचा था कभी कि, येसा भी दिन आयेगा
कोरोना नाम की बिमारी, ईतना हाहाकार मचायेगा

 © विनोद जेठुडी 24 मई 2020 at 2:10 PM 

Saturday, 28 November 2020

मैँ समाज सेवी बन गया हूँ

दुसरोँ के दुखोँ को सुलझाते सुलझाते, अपनो से ही उलझ गया हूँ । 
जिनसे घनी मित्रता हुआ करती थी कभी, आज उन्ही का दुश्मन बन गया हूँ 
मैँ भी येसो आराम से रह सकता हूँ लेकिन............
समाज सेवा के जूनुन से, दुसरोँ से अलग सा हो गया हूँ ॥
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

अब तो दिन भर इतना ब्यस्त रहेने लग गया हूँ,
कि अपने ही परिवार को भी समय नही दे पाता हूँ । 
घर पहुँचते ही बेटा लिपटकर पापा के सँग खेलना चाहता है.. 
लेकिन मै ब्यस्तता के कारण उसे समय नही दे पाता हूँ ॥ 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ! 

कुछ लोगोँ की तो गंदी-गंदी गालियाँ भी सुनता हूँ,
क्योकि उनका मानना है कि स्वार्थ के लिए यह सब करता हूँ ।
काश की हनुमान जी जैसे सीना फाड के दिखा सकता ....  
कि मैँ अपने लिए नही दुसरोँ के लिए जीना चाहता हूँ ॥ 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

छुट्टी के दिन भी परिवार को समय नही दे पाता हूँ 
क्योंकि उसी दिन ही लम्बित पडे कार्योँ को निपटाता हूँ 
बस पत्नि सँग इस बात मे ही लडाई हो जाती है कि ...
मैँ दिन भर फोन पे ही चिपका रहता हूँ ..... 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

अपने शौक और एच्छाओँ का दमन कर रहा हूँ  ।
चाह कर भी अपने लिये समय नही निकाल पा रहा हूँ 
पिक्चर देखे तो जैसेँ सालोँ हो गये हो मुझको .......
कविता लिखने का शौक भी पुरा नही कर पा रहा हूँ ॥ 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

रिस्तेदारोँ से अकसर सिकायतेँ सुनता रहता हूँ 
कि मैँ बडा बन गया हूँ, फोन नही करता हूँ 
उनका रुठना और सोचना भी बिल्कुल सही है .... 
लेकिन कैसेँ समझाऊँ उनको कि ब्यस्त रहता हूँ 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

अपनी मेहनत की कमाई से जो भी कमाता हूँ 
उसमे से कुछ रुपये दुसरोँ के लिए दान देता हूँ 
सँस्था बनाकर खुब पैसे छाप रहा है ...
फिर भी कुछ लोगोँ से यह सुनने को पाता हूँ 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

मुस्किल भरा सफर है फिर भी बढे जा रहा हूँ 
क्योंकि दुसरोँ की खुशी मे ही मैँ खुशी पा रहा हूँ 
इस समाज सेवा के चक्कर मे मैँ 
अपनोँ से दुर होते जा रहा हूँ । 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

दुसरोँ की खुशी के लिए यह सब कर रहा हूँ 
न निजी स्वार्थ इसमे, न कुछ कमा रहा हूँ 
दया धर्म का मूल मंत्र है इसलिए 
बस दयालुता धर्म निभा रहा हूँ ।। 
क्योंकि मै अब समाज सेवी बन गया हूँ!  

 © विनोद जेठुडी, 28/11/2020, 11:00 a.am 

Wednesday, 10 July 2019

नम आखोँ से बडे भाई को भावभिनी श्रधाँजली

भाई आज आपकी म्रत्यु के 3 महिने पुर्ण हो गए है । आज ही के दिन 10/04/2019 की सुबह वह अशुभ घडी थी जब आप इस दुनियाँ से चल बसे थे । वैसेँ तो जो इस दुनियाँ मे जो आया है उसका जाना भी सुनिश्चित है और यही जीवन का सत्य है परंतु मात्र 44 साल की अल्प आयु भी कोई जाने की उम्र होती है क्या ? आपका इस तरह से चले जाना और फिर कभी आपको न देख पाना इस कटु सत्य को स्वीकारना हम सब के लिए इतना आसान नही है ।  आपके चले जाने से येसा लग रहा है जैसेँ मानो सारी दुनियाँ मे अंधकार ही अंधकार सा छाया हो । बचपन की उन यादोँ को याद कर करके आखोँ से आंशुँ टपकने लगते है । हम तो किसी भी तरह से अपने दिल को मना लेते है लेकिन माँ जी, पिताजी जी का जो हाल है वह बयाँ नही कर सकता । माँ जी बहुत कमजोर पड चुकी है क्योंकि मात्र 26 साल की उम्र मे दीदी के इस दुनिया से चले जाने को वह हमेशा याद कर कर के रोती रहती थी लेकिन अब तो आप भी नही रहे तो और भी मुस्किल हो गय है । आपसे मुझे इस बात का भी शिकायत है कि आप हर रोज जो माँ जी और पिताजी को फोन करते थे वह आज भी आपके फोन का ईंतजार करते है इसलिए हर दिन अब मुझे फोन करना पडता है और मैँ यह आपके जाने के बाद बखुबी निभा रहा हूँ । 

भाई आपकी अल्प म्रत्यु हो जाने से आप जो भी इस मनुष्य जन्म की जिम्मेदारियोँ जैसेँ बच्चोँ की पढाई और उनकी शादी ईत्यादी को पुर्ण न कर सके, उन सभी जिम्मेदारियोँ को पुर्ण करने हेतु मै आपको बचन देता हूँ, आप जँहा कहीँ भी रहेँ सुख और शांति से रहेँ यही मै परमपिता परमात्मा से प्रार्थना करता हूँ । काश की प्रभू हमे इतना सा मौका दे देते कि आपको होस्पिटल तक ले जा पाते भले ही होस्पिटल मे ईलाज के दौरान यह अनहोनी हो जाती लेकिन हमे शकुन मिलता है कि हमने एक कोशिस तो की थी । 

आपकी हर एक यादोँ को मैंने सम्भाल के रखा है । आपकी हर एक भेजी हुई चिठ्ठी मैंने सम्भाल के रखी है और जीवन पर्यंत इन यादोँ को अपने साथ रखुँगा ।

जन्म - 08/08/1975 
म्रत्यु - 10/04/2019


Monday, 8 July 2019

पहाडोँ से होता पलायन एक गभीर समस्या - कारण और रोकथाम के उपाय



पहाडोँ से होता पलायन गभीर विषय है, पलायन के कारण और पलायन को रोकने के उपायोँ पर मेरे विचार :- 
एक तरफ जहाँ उत्तराखँड की खुबसुरत वादियोँ, कल कल छल छल करती नदियाँ, झरनोँ एँव प्राक्रतिक सौंदर्य को देखने के लिए देश विदेश से सैलानियोँ का तांता लगा हुआ है वहीँ दुसरी ओर यह हमारा बहुत बडा दुर्भाग्य है कि यहाँ के मूल निवासी यहाँ से पलायन करते जा रहेँ है । पलायन को रोकने के लिए उत्तराखँड सरकार ने पलायन आयोग का गठन भी किया लेकिन पलायन आयोग का गठन मात्र करने से हम पलायन नही रोक सकते बल्कि सरकार और समाज दोनो को मिलकर पलायन के कारणो और पलायन को रोकने के उपायोँ पर कार्य करने की आवश्यक्ता है । 
वैसे तो पलायन के बहुत सारे मुख्य कारण है लेकिन मेरी नजर मे जो 4 मुक्य कारण है वह है । 

१. जीवन यापन हेतु “रोजगार” का अभाव 
२ बेहतर शिक्षा का अभाव
३ स्वास्थ्य सुविधाओँ का अभाव 
४. मूलभूत सुविधाओ का अभाव 

सर्वप्रथम "रोजगार" पलायन का मुक्य कारण है और पलायन आयोग ने भी अपनी रिपोर्ट मे शायद यह कहा है कि 50% लोग रोजगार की तलाश मे पहाडोँ से पलायन करते है जिसमे की सबसे ज्यादा युवा वर्ग है जिनकी उम्र 26-35 वर्ष है इन आकडॉ से साफ होता है कि यदि हमे उत्तराखडँ मे रोजगार के अवस्रर मिल जाये तो हर कोई वापस अपनी देवभूमी मे रहना पसँद करेगा ।
·         सरकार रोजगार के अवसर के लिए छोटे छोटे लघु उध्योगोँ की स्थापना करेँ।
·         पढे लिखे युवाओँ को सस्ती दरोँ पर बैकँ से लौन मिले ताकि वह अपना रोजगार शुरु कर सके ।
·         ग्रामिण महिलाओँ के लिए स्वरोजगार के लिए छोटी छोटी कोओपरेटिव सोसाईटियोँ का निर्माण करवायेँ जाय ।
·         उत्तराखँडॅ के किसानो को और्गेनिक फुड के लिए प्रेरित करते हुये वहाँ के और्गेनिक फुड को अंतराष्टीय बाजार तक पहुँचाने मे सरकार मदद करेँ
·         उत्तराखँडॅ मे पर्यटन की अपार सम्भावनायेँ है उसके लिए कुछ पर्यटन स्थलोँ को विकसित किये जाय । ऋषिकेश, हरिद्वार, अल्मोडा और नैनिताल जैसे जगहोँ को योग और आयुर्वेद के केंद्र के तर्ज पर विकसित किये जाय ।
एत्यादि बहुत सारे सम्भावनाये है लेकिन उन पर कार्य करने की आवश्यक्ता है । 

दुसरी सबसे बडी कारण है बेहतर शिक्षा का अभाव - हर कोई चाहता है कि वह चाहे जैसेँ भी रहेँ पर अपने बच्चोँ को अच्छा सा पढा लिखा कर एक अच्छा ईंसान बनाएँ । अच्छी शिक्षा के लिए  यह जरुरी नही कि उत्तराखँडॅ मे प्राईवेट स्कुलेँ खोले जाय बल्कि उसके लिए जरुरी है कि सरकारी स्कूलोँ को प्राईवेट स्कूलोँ के तर्ज पर विकसित किये जाय और इन सरकारी स्कूलोँ मे बच्चोँ को प्राईवेट स्कूलोँ से भी बेहतर शिक्षा मिले ।
आखिर क्या कारण है कि प्राईवेट स्कूल के अध्यापको की सेलरी सरकारी स्कूलोँ के अध्यापकोँ की तुलना मे कम होने के बाबजुद भी वह और अच्छा सा पढा पाते है और प्राईवेट स्कोलोँ के पढे बच्चे ज्यादा कामयाब होते है हमे इस विचार्धारा को तोडने की आवश्यक्ता है । इसके लिए सरकार एँव सरकार के अधिकारियोँ को चाहिए कि वह स्वयँ कभी कभी स्कूलोँ मे सरप्राईज विजिट करेँ और वहाँ पर अनुपस्तिथ रह रहे अध्यापको के खिलाफ कार्यवाही करते हुए शिक्षा के स्तर का आकँलन करेँ । सरकार स्कूलोँ मे इंसपेकशन के लिए अधिकारियोँ के एक टीम का गठन करेँ और यह टीम हर साल हर स्कूल मे इंसपेशन करेँ और इंसपेक्शन रिपोर्ट के अनुसार स्कूल की रेटिगँ हो। इस इंसपेकशन मे अच्छे रेटिग पाने वाले स्कूलोँ और वहाँ के अध्यापको को प्रोतसाहित किया जाय और जिन स्कूलोँ की रेटिंग बहुत खराब आयी है उन्हे अगले साल अपनी पढाई के स्तर को बढाने के लिए दबाब बनाया जाय यह मै इसलिए कह रहा हूँ क्योकिँ मै स्वयँ यहा पर शिक्षा के क्षेत्र मे कार्यरत हूँ और यहाँ पर येसा ही होता है । 

पलायन का तीसरा जो मुख्य कारण है वह है स्वास्थ्य सुविधाओँ का अभाव - उत्तराखँड मे स्वास्थ्य सुविधाओँ के अभाव मे आये दिन हम न्युज चैनलोँ के माध्यम से सुनते रहते है कि स्वास्थ्य सुविधाओँ के अभाव मे किसी पेसेंट को एमर्जेंसी मे नजदिकी असपताल तक पहुँचाने के लिए पालकियोँ और डॅडियोँ के माध्यम से मीलोँ दुर चलना पडता है कभी कभी तो समय पर होस्पिटल न पहुँच पाने के कारण अनहोनी भी सुनने को मिलती है। सवयँ मेरी बडी बहन जिसकी उम्र मात्र 26 साल थी प्रसव पीडा के दौरान पालकियोँ के सहारे होस्पिटल ले जाते हुए इस दुनिया से चल बसी । सरकारी क्लिनिक जो नाम मात्र के कुछ जगहो पर खोले गये है वहाँ पर भी यदि डाक्टर और दवाईया एक साथ मिल गये तो यह भी कोई चमात्कार से कम नही इसलिए स्वास्थ्य सुविधाओ पर ध्यान देना अति  आवश्यक्ता है ।
 
चौथी मुख्य कारण है वह है “मूलभूत सुविधाओँ का अभाव”  गांवों में रोजगार और शिक्षा के साथ-साथ बिजली, पानी, आवास, सड़क और संचार जैसी बुनियादी सुविधाएं शहरों की तुलना में बेहद कम है जो कि पलायन का चौथा मुख्य कारण है । जिस सुगमता से शहर मे जीवन यापन हेतु मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध है उसकी तुलना मे पहाड का जीवन पहाड जैसे संघर्ष भरा है क्योंकि हर एक वस्तु के लिए आपको मिलो चलना पडता है । यदि खेती भी करेँ तो जगलीँ जानवरोँ का आतँक बहुत बढ गया है ।

आदि बहुत सारे कारण है लेकिन उन सभी कारणो मे से यह 4 कारण मुख्य है जिस पर सरकार और समाज दोनो को कार्य करने की आवश्यक्ता है | मेरी सरकार से निवेदन है कि यदि सच्चे अर्थो मे आप उत्तराखँड से पलायन रोकना चाहते हो तो सबसे पहले गैरसैण को उत्तराखँड की स्थायी राजधानी बनाओ तभी जाकर आप पहाड के दर्द को समझ सकते है और उस पर कार्य कर सकते है साथा ही मै निवेदन करता हूँ अपने सभी प्रवासी उत्तराखँडी भाई बहनो से कि वह जहाँ कहीँ भी रहेँ साल मे एक बार अपनी जडोँ से जुडे रहने हेतु एक बार अपने पैत्रिक भूमी उत्तराखँड अवश्य जायेँ ।

जहाँ कँही भी रहेँ अपनी जडोँ से जुडेँ रहेँ । 

धन्यवाद ! 
 © विनोद जेठुडी on 07/07/2019 @ 13:45

Friday, 8 March 2019

अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की सुभकामनाएँ

बस इतना हमें रखना है ध्यान
कि न करें कभी किसी का अपमान
हर महिला को मिले सम्मान C
और हर नारी पर हो अभिमान

समस्त नारी शक्ति को अंतराष्ट्रीय महिला दिवस की सुभकामनाएँ

© Vinod Jethuri 8 March, 2019

Wednesday, 2 January 2019

नम आखोँ से दादी जी को अलविदा और भावभिनी श्रधाँजली

दादी जी का जन्म अनुमानित सन 1919 से 1921 के मध्य हुआ था और लगभग 100 साल की उम्र मे आज दिनाँक 01/01/2019 को रात्री के 10 बजे दादी जी ने अंतिम साँस ली । दादी जी को अश्रुपुर्ण श्रधाँजली और परमपिता परमात्मा उनकी आत्मा को अपने चरणो मे स्थान दे यही हम प्रार्थना करते है ।
दादी जी का जन्म उस समय हुुआ जब भारत के इतिहास मे पहली बार सूखे और गरीबी के कारण बड़ी संख्या में लोगों की मौते हुई थी और भारत की अवादी घटने लगी थी । दादी जी उस जमाने की बाते बतायी करती थी थी कि किस तरह से एक वक्त की रोटी के लिए कठिन परिश्रम करना पडता था । मात्र 13 साल की उम्र मे दादी जी की शादी हो गयी थी और तत्पश्चात 13 बच्चोँ का जन्म और उनका भरण - पोषण करना कितना मुस्किल था यह दादी हमे बताती थी ।

दादी जी बताती थी कि वार्टर सिस्टम के तहत खाने की वस्तुओँ का आदान प्रदान होता था लेकिन नमक और ग़ुड के लिए "ढाकर" ऋषिकेश तक जाना पडता था क्योंकि नमक और चीनी पहाडोँ मे नही होता था । "ढाकर" के लिए लिए गाँव के आदमियोँ का एक समूह गाँव से ऋषिकेश के लिए निकलते थे और जगल के पैदल रास्तो से होकर 1 महिने बाद गुड और नमक ले कर आते थे । उस समय गाँव मे सडक की ब्यव्स्था नही थी इसलिए पैदल रास्ते से होकर जाना पडता था, माळू की टांटियोँ के चप्पल बनाये जाते थे और रास्ते मे रुककर जँगलोँ से कंदमुल फलोँ को भुनकर खाते थे साथ ही पत्त्थरो को गर्म करके उनमे रोटियाँ बनायी जाती थी और जब 1 महिने बाद ढाकरी गाँव पहुँचते थे तो उनके पैरोँ मे बडे बडे छाले होते थे । 

दादी बताती थि कि गाँव मे घी, अनाज एत्यादि लेकर राजा के यहाँ कर के रुप मे उसे पहुँचाते थे, एक गाँव वाले दुसरे गाँव तक और दुसरे गाँव वाले वहा से आगे राजा के दरबार तक यह सामान पहुँचाते थे ।
खाने के लिए जब कुछ नही होता था तो पिन्ना (तिल से तेल निकालने के बाद जो रौ मटिरियल बचता है पिन्ना कहलाता है) खाया करते थे साथ ही गेँठी, तैड, और बसिगुँ उबालने के बाद उसे खा कर पेट की भुख मिटाते थे, बरतन न होने के कारण परिवार मे 13 बच्चे एक ही परात (बडी सी थाली) मे खाना खाते थे, मेरे दादा जी बच्चोँ को खिलाने के लिए सिर्फ परात मे हाथ रखते थे लेकिन खाना नही खाते थे क्योंकि वह बस बच्चोँ का पेट भरना चाहते थे । 

मेरा दादी जी से अधिक लगाव रहा है जब भी समय मिलता था दादी जी के साथ मे बैठ जाता था और उस जमाने की बाते पुछा करता था, दादी जी को भी अपने दिनो की यादोँ को साझा करने मे अच्छा लगता था । मैंने महसुस किया है कि यदि हम बुजुर्गोँ के साथ बैठ कर थोडा बहुत उनके साथ बातेँ करे तो उन्हे बहुत अछा लगता है ।
आज दादी जी भले ही वैकुँठ धाम पधार गये है लेकिन आपके द्वारा दी गयी शिक्षा, जानकारियाँ और आपकी यादेँ सदा हमारे साथ रहेगी जो कि मैंने कुछ जानकारियाँ लिख कर सग्रँह कर लिए है और कुछ अपने मस्तिष्क मे याद कर ली है जो के हमेशा मेरे साथ रहेगी ।
दादी जी को एक बार पुँन भावभिनी श्रधाँजली
आपकी यादेँ सदा हमारे दिलोँ मे रहेगी ।
अलविदा दादी जी ॥

Wednesday, 25 July 2018

जातिगत आरक्षण एक अभिशाप

मराठा आंदोलन, जाट आंदोलन, गुर्जर आंदोलन, पटेल आंदोलन और न जाने कितने येसे आंदोलन है जो एक उदाहरण प्रस्तुत करते हैं कि समाज में कुछ सर्व संपन्न लोग आरक्षण के नाम दिन प्रतिदिन आंदोलन करते रहते हैं और राष्ट्रीय सम्पति को नुकसान पहुँचाने के साथ साथ दुसरे लोँगो को कष्ट पहुँचाते है । 
यदि योँ ही चलता रहा तो वह दिन दुर नही जब पुरे देश के हर एक कोने से आरक्षण आरक्षण की आवाजेँ सुनाई देगी । अधिकतर देखने में आया है यह वह समुदाय है जो उस राज्य मे सबसे समृद्ध समुदायों में से एक माने जाते है । आज आवश्यक्ता है कि आरक्षण के विरोध मे पुरे देश मे आंदोलन किया जाय और और माँगे यह हो कि 
“जातिगत आरक्षण को खत्म करो और
आर्थिक स्तिथी के अनुरुप आरक्षण हो”

भारतीय संविधान मे इस उद्देश्य से आरक्षण का प्रावधान बनाया गया था कि समाज के कमजोर वर्गों में शैक्षणिक और आर्थिक हितों विशेषत: अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों का विशेष ध्‍यान रखा जाय और उन्‍हें सामाजिक अन्‍याय एवं सभी प्रकार के शोषण से संरक्षित रखा जाय जिसमे 1950 में 10 साल (1960 तक) तक SC के लिए 15%, ST के लिए 7.5% आरक्षण की बात कही गई थी। धीरे-धीरे इसे खत्म करने की बजाय इसमें और इजाफा होते जा रहा है और आज स्तिथी यह है पिछले 65 साल में मदद का यह रवैया न केवल बढ़ता गया है बल्कि इसका दायरा और स्तर भी इतना बढ़ चुका है, जितना कि हमारे संविधान निर्माताओं ने कल्पना तक न की होगी। जब तक कोई आरक्षण को खत्म करने की बात करते है तब तक कोई दुसरा समूदाय आरक्षण के लिए आंदोलन शुरु कर देता है । 
आज स्थिति यह है कि हर किसी को आरक्षण चाहिए किसी को भी मेहनत नहीं करनी है बस फ्री की आदत पड गयी है और देखा देखी एक दुसरे लोग भी इनका अनुसरण करने लगे है लेकिन इस आरक्षण रूपी अभिशाप से बहुत से प्रतिभावान लोग पिछे रह जाते है । 
देश के उन समुदायों को जो आये दिन आरक्षण के नाम पर आंदोलन करते रहते हैं को उत्तराखंड जैसे राज्य और उनके लोगों से जो पहाडी राज्य के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में विषम परिस्तिथियोँ मे रहते है जँहा पर न तो उस स्तर की शैक्षणिक सुविधायेँ उपलब्ध होती और न ही आर्थिक स्तिथी मजबूत है लेकिन बाबजूद इसके कभी भी  आरक्षण की माँग नही कि जबकी सच्चे अर्थो मे उन्हे आरक्षण की कितनी आवश्यक्ता है यह हर कोई समझ सकता है । 
पहाडी लोग स्वभाव से मेहनती और स्वावलंबी होते हैं और दुसरो से फ्री की मिली हुई चिजो से बेहतर मेहनत और हुनर मे विश्वास रखते है | आज देश मे आवश्यक्ता है कि हम सब मिलकर जातिगत आरक्षण के खिलाफ आवाज उठायेँ और इस आरक्षण रुपी अभिशाप को देश ने निकाल फेँके और उन लोगोँ के हितो के लिए कार्य करेँ जिन्हे सच मे आरक्षण की आवश्यक्ता है । 

धन्यवाद ! 
विनोद जेठुड़ी

Thursday, 27 July 2017

इतिहास गवाह है कि जब जब पुत्र मोह जागी है तब तब सत्ता भागी है


  • लालू का पुत्र मोह विहार ले डुबा
  • मुलायम का पुत्र मोह उत्तर प्रदेश ले डुबा
  • कैकई का पुत्र मोह जशरथ की जान ले गया 
  • धृष्टराष्ट्र का पुत्र मोह महाभारत जैसे युद्द करवा बैठा
  • राजमाता शिवागामी का पुत्र मोह महिस्पति राजसिंहासन ले डुबा
  • गुरु द्रौण का पुत्र मोह के कारण अश्वत्थामा आज भी प्रथ्वी पर भटक रहा है 
  • और सोनिया गाँधी के पुत्र मोह  के कारण काग्रेस मुक्त भारत का निर्माण हो रहा है 
                                        विनोद जेठुड़ी  

Tuesday, 25 July 2017

अमर शहिद श्री देव सुमन को अश्रुपूर्ण श्रद्धांजलि एँव श्रद्धा सुमन अर्पित



जब पुरा देश गुँज रहा था, आजादी के नारोँ से
तब टिहरी रियासत तडप रही थी
, राजा के अत्याचारोँ से
कोई नही बच पाता था इन, “कर” लेने आये साहूकारोँ से 
तब जा के एक "श्री देव" आया था, लडने इन अंधियारोँ से

दयालु हर्दय के कारण आप "सुमन" कहलाये थे 
अत्याचारोँ के खिलाफ, सदा आवाज उठाते थे
आजादी की लडाई मे भी सबसे आगे रहते थे
साहित्य, सम्पादन और सम्मेलन से सदा जुडे रहते थे

बँमुँड पट्टी के जौळ गाँव के आप मूल निवासी थे
हरिराम और तारा देवी के तीसरे लाडले बेटे थे
गायत्री बहन और परशुराम, कमलनयन दो भाई थे
विनय लक्ष्मी जैसी पत्नि का, हर पल साथ पाते थे

कुनैन के नसातंर्गत इंजेक्शन तुम्हे लगाये जाते थे
जिससे तुम पानी पानी चिल्लाते रहते थे
मोहन सिँह जेलर की यातनाये, बहुत तूम सहा करते थे
पत्थर पीस कर रोटी बनाते, फिर तूम्हे खिलाते थे

जानवरोँ जैसा ब्यव्हार, “सुमन”  आपसे किया करते थे
सजा दिलाने के लिए,  झूठे आरोप बनाते थे
209 दिनो तक मुजरिम बनकर, कारावास मे विताये थे
फिर 84 दिनो के अनशन मे अपनी जान गवायेँ थे

25 जुलाई 1944 को सुमन आपने प्राण त्याग दिये
बोरी मे बाँधकर आपके शरीर को, भिलंगना मे बहा दिये
जन अधिकारोँ की लडाई मे आप अमर शहिद हो गये
राजा की नौकरशाही से जनता को आजाद करा गये 

मैँ अपने शरीर के कँण - कँण को नष्ठ हो जाने दुँगा

लेकिन नागरिकोँ के अधिकारोँ का शोषण नही होने दुँगा
निर्ममता और तानाशाही के खिलाफ आपके नारे थे
दृढ इच्छा, दृढ़ शक्ति, दृढ़ आपके इरादे थे 

अमर शहीद के बलिदान दिवस पर, पुष्पांजली अर्पित करता हूँ 
जन्म दिया जिस मां ने तुमको, उसको प्रणाम करता हूँ 
जौल गाँव की उस मिट्टी से मै तिलक लगाता हूँ 
नम आंखों से भावभिनी श्रन्धांजली अर्पित करता हूँ 

© विनोद जेठुड़ी 

Monday, 17 July 2017

जिम्मेदारियां


सुबह सुबह उठ कर निकल जाता हूँ
अपनी राह पर .......
शाम होते ही पहुँचता हूँ
अपने ठिकाने पर
अंधेरा मे जाता हूँ
अंदेरा मे आता हूँ
अंधेरे मे ही परिवार से
फोन पर बात कर लेता हूँ

जिम्मेदारियोँ को निभाने निभाते
जिम्मेदार बन गया हूँ
इसी जिम्मेदारी के खातिर
यँहा परदेश आया हूँ ।
जब आया था, तो सोचा
बस, 3 साल की बात है
लेकिन आज 13 साल हो गये
वापस जाने की हिम्मत
न जुटा पा रहा हूँ ॥

कभी कभी तो सोचता हूँ कि
छोड छाड के के चले आता हूँ  
अपने देश मे ......
फिर “जिम्मेदारियाँ” कहती है....
क्या कमा पाओगे इतना पैसा वहाँ ?
जितना है इस परदेश मे ॥

वतन की जब कोई तसवीर
फेसबूक पर देखने को मिलती है  
सच बोलूँ यार, उसी वक्त
बतन की बहुत याद आती है ।
शादी, ब्याह और त्योहारोँ मे
जब परिवार की फोटो आती है
देख देख कर मन भाऊक हो जाता है  
और आंखे भर आती है 

© विनोद जेठुड़ी 

Thursday, 13 July 2017

प्रकृति का दर्द

अपने आशियानो को जलाकर भी
घर तुम्हारा रोशन किया हमने ।
कर्ज कैसे अदा करोगे हमारा ?
जब फर्ज ही भुला दिया तुमने ॥
                          "Pain of Nature"
+Vinod Jethuri

समय के साथ मदद के हाथ


उम्र ढलती गयी, समय निकलता गया
निम्मेदारियों को अपनी, बखूबी निभाता रहा
कभी किसी की मदद करने का समय ही न मिला
अब जब समय मिला तो खुद मदद के लिए  तरसता रहा

©  विनोद जेठुडी 
www.dayaluta.blogspot.in 

पर्यावरण सरक्षण की दिशा मे योजनाविहीन सरकार को सुझाव - "पेडोँ से है रिश्ता हमारा"

   हम गाँववासियोँ के सहयोग से अपने क्षेत्र मे पर्यावरण सरक्षण के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुय विर्क्षारोपण करना चाहते है । इसी सम्बंध मे जब हम पौधोँ के लिये क्षेत्रिय कार्यालय डी.एफ.ओ औफिस मुनि की रेति मे आवेदन किया तो डी.एफ.ओ साहब ने यह कह कर मना कर दिया कि इस वर्ष सरकार की येसी कोई योजना नहि है जिसके तहत हम आपको पौधे मुहैया करा सकेँ और अगर कोइ येसी योजना आयेगी तो आपको पौधे मिल जायेंगे । डी.एफ.ओ साहब ने अपनी ड्युटी निभाते हुए बिल्कुल सही किया ।
   मेरा एक सुझाव है कि सरकार को पर्यावर्ण सरक्षण की दिशा मे कार्य करना होगा, कोई येसी योजना बनानी होगी जिससे लोगो को विर्क्षो को लगाने व उनकी देखभाल करने के लिये प्रेरित करना होगा । दुख: हुआ सुनकर कि वर्तमान सरकार ने अभी तक येसी कोई योजना नही बनायी है जिसके तहत विर्क्षारोपण हेतु लोगोँ को प्रेरित किया जाय ।
    इससे अच्छी तो पिछली सरकार थी जिसने “हमारा पेड हमारा धन” और "हरियाली" जैसी योजनाएँ लाकर पर्यावरण सरक्षण के प्रति अपनी कर्तब्यनिष्ठा दिखाई । सरकार जल्द से जल्द अगर येसी कोई योजना नही लाती है तो वन विभाग के नर्सरियोँ मे जो लाखोँ पौधे पेड पैधारोपण के लिए तैयार है हर साल की तरह सडकर नष्ट हो जायेँगे क्योंकि सरकार खुद पौधेरोपण करेगी नही और जो कोई करना चाहतेँ है उनको फ्री मे पैधा देगी नही ।
   वन विभाग भी अपनी ड्युटी निभाते हुए अपनी नर्सरी मे पौधे तैयार तो कर देती है लेकिन सरकार की योजाना का एंतजार करती रहती है और योजना तब बन कर आती है जब तक वर्षा रितु खत्म हो जाती है । 
सुझाव :- पेडोँ से है रिश्ता हमारा
    पेड का हमारे जीवन में भोजन और पानी की तरह महत्वपूर्ण हैं, पेड़ के बिना मानव जीवन की कल्पना करना व्यर्थ है | हमें स्वस्थ और समृद्ध जीवन देने में पेड़ो का बहुत महत्वपूर्ण योगदान है । हमें अधिक से अधिक संख्या में अपने निजी और सरकारी जमीन पर वृक्ष लगाने चाहिए जिससे प्रकृति का संतुलन बना रहे और प्राकृतिक आपदाओं को रोका जाय | वन, भूस्कलन को रोकते है और हमें शुद्ध ऑक्सीजन देते है । वन देश और राज्य की प्रगति में हमें आर्थिक सहयोग देते हैं | मानव सृष्टि का सर्वश्रेष्ट प्राणी है इसलिए वृक्षारोपण मानव समाज का दायित्व है |
    प्राचीन काल से ही मानव और प्रकृति का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है । भोजन, वस्त्र और आवास की समस्याओं का समाधान भी इन्हीं वनों से हुआ है । 
बचपन में लकड़ी के पालने में झूलना, बुढ़ापे में उसका सहारा लेकर चलना और जीवन लीला की समाप्ति पर इन्हीं लकड़ियों पर सोना मनुष्य की अन्तिम गति है । इन वृक्षों से हमें शुद्ध ऑक्सीजन मिलती है । घने वनों की हरियाली देखकर मन प्रफुल्लित हो उठता है ।
वृक्ष स्वयं धूप में रहकर हमें छाया देते हैं । जब तक हरे-भरे रहते हैं तब तक हमें फल, सब्जियां देते हैं और सूखने पर ईंधन के लिए लकड़ी देते हैं । इन्हीं वृक्षों की हरी पत्तियों और फलों को खाकर गाय, भैंस, बकरी आदि जानवर दूध देते हैं जिसमें हमें प्रोटीन मिलता है ।
   अर्ताथ: कह सकते है कि पेड नही तो जीवन नही जो आदि काल से पेडोँ के साथ हमारा रिश्ता चला आया है हमे वह रिश्ता निरंतर कायम रखना होगा, इसलिये इस कार्यक्रम का नाम “पेडोँ से है रिश्ता हमारा” सुझाया गया है ।
  प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है कि वह अपने जीवन में एक वृक्ष अवश्य लगाए । आज हम स्वार्थ के लिए पेड़ तो काटते है लेकिन लेकिन पेड़ लगाना भूल जाते है जिससे ग्लोबल वार्मिग की समस्या आज इतनी उग्र होती चली जा रही है । हर एक ब्यक्ति को पेडोँ के साथ अपना एक रिश्ता कायम करना होगा और यह रिश्ता जीवन भर चले इसलिए लगाये गये पेड की देखभाल करे । योँ तो हर साल लाखोँ पेड लगते है लेकिन रखरखाव के अभाव मे बहुत कम पेड ही जीवित रह पाते है । पेडोँ के साथ हमारा अटैचमेँट होना जरुरी है । हमे जो भी लोग पेड लगएँ उनकी देखभाल करने के लिये उत्साहित और प्रोत्साहित करने की आवश्यक्ता है ।
यों तो उत्तराखंड के जंगलो में हर साल गर्मियों में आग लगती है परन्तु पिछले साल 2016 की गर्मियों में फरवरी से अप्रैल तक 88 दिनों से जादा समय तक लगी भीषण आग से 3 हजार एकड के लगभग जमीन जलाकर खाख हो गयी जो पेड जल गये अब समय है कि विर्क्षारोपण करके उन जगँलो को फिर से हरा भरा बनाया जाय ।
   बहुत सी योजनायेँ जैसे जन्मदिवस पर, शादी के अवसर पर, बच्चे के चुडाक्रम के अवसर पर शादी की वर्षगाँठ के अवसर पर, किसी सुभ कार्य के अवसर पर, अपने परिवार के किसी ब्यक्ति के नाम पर आदि बहुत सी अवसर पर लोग विर्क्षारोपण करते है जिसकी मै सराहना करता हूँ लेकिन लगाये गये पौधे की पेड बनने तक देखभाल करना और उस पेड के साथ अटैचमेँट होना बहुत जरुरी है क्योंकि कभी कभी देखने को मिलता है फोटो मे पेड तो लग गए लेकिन कुछ दिन बाद देखो तो वह पौधा सुख चुका होता है ।
    चिपको आंदोलन के जैसे एक क्रंति की आवश्यक्ता है और मै चिपको आंदोलन का बहुत बडा समर्थन करता हूँ क्योंकि इस आन्दोलन मे प्रकृति और मानव के बीच जो रिश्ता था जो बीच मे आ गया था और लाखोँ पेड कटने से बच गये थे ।
    आशा करता हूँ कि सरकार इस सुझाव पर अमल करते हुए जल्द से जल्द कोई येसी योजना बनायेगी जिसके तहत इस साल भी हम प्रकृति को बचाने हेतु कुछ पौधोँ का विर्क्षारोपण करने मे सफल होँ ।
    आओ अपने जीवन में एक पौधा लगाए और पेड़ बनने तक उसकी देखभाल करे तभी सच्चे अर्थो मेँ हम प्रकृति के साथ अपना रिश्ता कायम करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभा पाएंगे | 
धन्यवाद !

विनोद जेठुडी
प्रकृति प्रेमी

शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ - 2022

 शिक्षा का दान करने वाले महान होते हैँ ।  शिक्षक के रुप मे वह, भगवान होते हैँ ॥  शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ