पर पीड़ा से दुःख पहुंचे जो प्राणियों से प्रेम करता है, करुणामय हर्दय जिसका "दयालुता" कहलाता है || सत्य का साथी झूठ विरोधी जो मानव अपनाता है, "मानवता" धर्म निभाकर "दयालुता" कहलाता है || दयालु जीवन पाकर के जो परोपकारिता करता है, दया धर्म और कर्म है पूजा सबसे बड़ा धर्म निभाता है || छोड़ के "दयालुता" को जो अभिमानी बन जाता है, बिन "दया" के मानव न ओ दानव कहलाता है || पहला गुण मानव का ये "दयालुता" कहलाता है, "मानवता" धर्म निभाकर "दयालुता" कहलाता है ||
Sunday, 26 April 2015
सुखी जीवन का जीना
चाहे फूलोँ के महल मे हो आशियाना
हो चाहे झुग्गी- झोपडी मे रहना
नीन्द जँहा सकून की आ जाए मेरे दोस्तोँ
वही है सुखी जीवन का असली मे जीना
सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी
Thursday, 23 April 2015
किसान रैली मे किसान गजेन्द्र की आत्महत्या

कल दिनाँक 22 अप्रैल 2015 को आम आदमी पार्टी की रैली मे एक किसान गजेन्द्र सिँह की आत्महत्या का ममला मानवता को शर्मशार करने वाली घटना है । किसान गजेन्द्र सिँह आम आदमी का सक्रिय कार्यकर्ता बताया जाता है और रैले के लिये आमंत्रण मिलने पर ही ओ दौसा जिला, राजस्थान से वँहा आया था ।
इस आत्महत्या के लिए आम आदमी पार्टी के साथ साथ वँहा पर तमाशा देख रही समस्त जनता, मिडिया व पुलिस भी जिम्मेदार है । सब लोग तमाशा देखते रहे और किसी के मन मे भी इतनी सी एंसानियत नही जागी कि उसे पेड से निचे निकाला जाय ।
आम आदमी पार्टी आम आदमी होने का ढकोसला करने वाले अरविन्द केजरीवाल वँहा से मात्र 30 सेकिंड की दुरी पर भाषणवाजी करते रहे और पल-पल की खबर लेते रहे, पुलिस तथा दुसरे लोगोँ को जिम्मेदार बताने वाले क्या आपकी इतनी जिम्मेदारी नही बनती कि खुद चले जायेँ या अपने किसी कार्यकर्ता को उसे निचे निकालने को कहा जाय ? और अगर खुद भी चले जाते तो कौन सी उनकी पद और गरिमा कम हो जाती। फिर जब घटना घटित हो जाती है बोलतेँ है कि पुलिस हमारे कँट्रोल मे नही ।
कुमार विश्वास कहते है कि “लटक गया” और उनके चेहरे पर कोई भी दुख का भाव प्रकट नही होता जैसे मानो उन्हे पहले से ही इस बात की खबर थी । क्योँ उसी वक्त अपनी भाषणवाजी बँद नही की गयी और भाषण फिर भी चलता रहा ?
आशुतोष कहते है कि दिल्ली के मुख्यमँत्री को पेड पे चढ जाना चाहिये था और खुद उतारना चाहिये था आघे से अगर येसी घटना होती है तो मुख्यमँत्री जी से निवेदन करुँगा कि खुद जाये। माननिय आशुतोष जी अगर चले भी जाते तो छोटे हो जाते वैसे भी तो ओ बोलते है कि मै आम आदमी हुँ ।
सोमनाथ भारती और अलका लाम्बा को तो जैसे ट्वीट करने की बहुत जल्दी पडी थी गजेन्द्र के मरने से पहले ही श्रधाँजली दे डाली ? येसा लगता है जैसे मानो पुरी आम आदमी पार्टी को पहले से इस बात की खबर थी और कँही ये जानबुझ कर किया हुआ गेम प्लान तो नही ?
जनता जनार्धन (तमाशा देखने वाली) बाद मे आसुँ बहाने वालोँ और विरोध मे रैली करने वालोँ जब आप सब तमाशा देख रहे थे क्या किसी के हर्दय मे दयालुता और मानवता नाम का कुछ भी अँश नही बचा जो कोई उसे निचे उतारने कि हिम्म्त करता आप सब लोग भी गजेन्द्र किसान की म्रत्यु के लिये जिम्मेदार है ।
पुलिस प्रशासन बताया जा रहा है कि मात्र कुछ दुरी पर पुलिस का एक थाना स्तिथ है और किसी ने इतना साहस नही किया कि उस बेचारे किसान को बचाया जाय । पुलिस तो बाद मे जाँच शुरु करेगी पहले घटना तो घटित हो जाने दिजिये ! जब तक घटना घटी नही तब तक हम कुछ नही कर सकते । घटना होने दो फिर जाँच शुरु होगी और फिर जाँच कमेटी बनेगी 20 साल बाद रिपोर्ट आयेगी कि जिस पेड पर ये घट्ना हुयी थी वँहा पर येसा कोई पेड है ही नही ।
मिडिया को अपने चैनल का टी आर पी जो बढाना है इस घटना को कवरेज करना है और बाद मे लिखना है सबसे पहले सबसे तेज हमने ये घटना अपने कैमरे मे कैद किया है । उसके बाद 1 हफ्ते की खबर पुरी हो गयी है अब शुरु होगा आरोप प्रत्यारोप । क्या मानवता के नाते आपकी भी जिम्मेदारी नही बनती कि थोडा सा कैमरे को किसी और को दे कर उसकी जान बचाने कि कोशिस की जाती ? तब जा के सच्चे अर्थोँ मे आपके चैनल का टी आर पी बढता ।
दुसरोँ को बोलना बहुत आसान होता है कभी अपने गिरेवान मे भी झाक लिया करेँ ।
समूण सँस्था वहाँ पर उपस्थित लोगोँ को इस हत्या के लिये जिम्मेदार मानती है जो कि गरिब, लाचार और बेबस किसान गजेन्द्र को आत्मह्त्या के लिये उकसाने का कार्य कर रहे थे । दोषियोँ के खिलाफ कडी से कडी सजा हो ये हम माँग करते है ।
सभी राजनितिक व गैर राजनितिक पार्टियोँ से विनम्र निवेदन करती है कि किसानो के हितो की आढ मे अपनी राजनिती की रोटियाँ न सेकेँ ।
विनोद जेठुडी
23.04.2015
Tuesday, 17 March 2015
ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ
एक ही घर मे सँग – सँग रहिवेँ
सास, बहु और ननद कहलाइवेँ
ननद, बडी तेज से जावे
टीक टीक करके सोर मचावे
बहु, मध्यम – मध्यम जावे
सास बेचारी चल ना पावे
एक दुसरे का साथ निभावेँ
एक रुके तो सब रुक जावेँ
प्यार प्रेम का पाठ पढावे
ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ
जो घडी जावे फिर न आवेँ
सुखी दिनो की जब घडी आवेँ
दुखियारोँ को भुल न जावेँ
घडी घडी मे घडी घट जावेँ
घडी घडी का लाभ उठायेँ
ये घडी हमे ओ घडी दिखावे
सास बहु थी कभी बतावे
ननद बहु बनकर जावे
समय, समय पर सबका आवे
ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ
समय, समय पर सबका आवे
विनोद जेठुडी, 11/03/2015 @ 08:00 A.M
Tuesday, 10 February 2015
देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई
देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई
कहीँ मनायीँ गयी खुशियाँ, और कहीँ हुयी रुसवाई
जो भी सीँटे पायी थी, ओ भी आज गवाँयी
ओवर कौन्फिडेँट ने आज, बीजेपी को है
डुबाई
बेदी को कैप्टन बना कर, खुद ही नाव डुबाई
क्या जितायेगी दूसरोँ को जो खुद ही जीत न पाई
बहुमत से सरकार बनेगी, थी ये चर्चा सारी
मोदी लहर की दिल्ली मे, आँधी पहुँच न पाई
15 साल से दिल्ली को लूटती रही ओ काकी
माखन ही सी.एम बनेगेँ बोलते थे पप्पु भाई
50 सालोँ की मेहनत ने आज, जीरो मे सिमटाई
जनता जनार्धन ने, कैसे उनको, आज फटकार लगाई
49 दिनो मे जो सिखा था, ओ 67 बनकर के आई
70 भी ले आते अगर, सरकार न होती गिरायी
दुसरोँ का हाथ पकडना, रास न उनको आई
रिकोर्ड तोड सीटो से, बहुमत की सरकार बनायी
बँगला, गाडी लूँगा अब तो लूँगा सब सरकारी
ईलाज भी करवाउँगा और खाँसी की लूँगा दवाई
हर मुद्दे मे सी एम अब, करेगा खुद सुनवाई
जो बोला था सब करुँगा, चँदे की ईंक्वारी
देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई
कहीँ मनायीँ गयी खुशियाँ, और कहीँ हुयी रुसवाई
जो भी सीटेँ पायी थी, ओ भी आज गवाँयी
ओवर कौन्फिडेँट ने आज, बीजेपी को है डुबाई
विनोद जेठुडी, 02/10/2015 @ 01:00 P.M
Monday, 13 October 2014
दोस्त – शहिद वीर सिँह को भावभिनी श्रधाँजली
शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वाले का यही बाकि निशाँ होगा......
कभी समय
था जब हम साथ मे स्कुल जाया करते थे
कभी समय
था जब हम साथ मे ट्युसन पढा करते थे
कभी समय
था जब हम साथ मे खेला करते थे.... और
एक ओ भी
समय था जब हम साथ मे भर्ती होने गये थे
ओ उस दिन
भर्ती हो गया और हम बहार हो गये .......
ओ फौजी और
हम विदेशी बन गये ...................
मिलना
जुलना नही हुआ सालो से, बस सोचते रह गये
मिलेंगे
पुरसत से कभी, येसा ओ मुझसे कह गये
क्या सोचा
योँ मिलेंगे कि सोचते रह गये
ओ देश
सेवा के लिये, शहिद हो गये...
मिलने के
ओ सपने, सपने रह गये
तिरँगे मे
बँद अंतिम दर्शन मैने भी कर लिये
दोस्ती की
कसमो को कुछ योँ निभा गये
खट्टी -
मिठ्ठी यादोँ के सहारे छोड गये
दोस्त
तेरी अंतिम यात्रा मे भी हम आ न सके
श्रधांजली
नम आखोँ से यही से दे गये ।
भारत माँ
के बीर सपूत तुम बिन बोले चले गये
माता पिता
सँग पत्नि और दो नन्ही बेटियाँ छोड गये ॥
विनोद
जेठुडी
Thursday, 19 June 2014
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