Tuesday, 17 March 2015

ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ


एक ही घर मे सँग – सँग रहिवेँ
सास, बहु और ननद कहलाइवेँ
ननद,  बडी तेज से जावे
टीक टीक करके सोर मचावे
बहु, मध्यम – मध्यम जावे
सास बेचारी चल ना पावे
एक दुसरे का साथ निभावेँ
एक रुके तो सब रुक जावेँ
प्यार प्रेम का पाठ पढावे
ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ
जो घडी जावे फिर न आवेँ
सुखी दिनो की जब घडी आवेँ
दुखियारोँ को भुल न जावेँ
घडी घडी मे घडी घट जावेँ
घडी घडी का लाभ उठायेँ
ये घडी हमे ओ घडी दिखावे
सास बहु थी कभी बतावे
ननद बहु बनकर जावे
समय, समय पर सबका आवे
ये घडी हमे ओ घडी बतावेँ
समय, समय पर सबका आवे

विनोद जेठुडी, 11/03/2015 @ 08:00 A.M  

Tuesday, 10 February 2015

देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई

देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई
कहीँ मनायीँ गयी खुशियाँ, और कहीँ हुयी रुसवाई
जो भी सीँटे पायी थी, ओ भी आज गवाँयी
ओवर कौन्फिडेँट  ने आज, बीजेपी को है डुबाई

बेदी को कैप्टन बना कर, खुद ही नाव डुबाई
क्या जितायेगी दूसरोँ को जो खुद ही जीत न पाई
बहुमत से सरकार बनेगी, थी ये चर्चा सारी
मोदी लहर की दिल्ली मे, आँधी पहुँच न पाई

15 साल से दिल्ली को लूटती रही ओ काकी
माखन ही सी.एम बनेगेँ बोलते थे पप्पु भाई
50 सालोँ की मेहनत ने आज, जीरो मे सिमटाई   
जनता जनार्धन ने, कैसे उनको, आज फटकार लगाई

49 दिनो मे जो सिखा था, ओ 67 बनकर के आई
70 भी ले आते अगर, सरकार न होती गिरायी
दुसरोँ का हाथ पकडना, रास न उनको आई
रिकोर्ड तोड सीटो से, बहुमत की सरकार बनायी

बँगला, गाडी लूँगा अब तो लूँगा सब सरकारी
ईलाज भी करवाउँगा और खाँसी की लूँगा दवाई
हर मुद्दे मे सी एम अब, करेगा खुद सुनवाई
जो बोला था सब करुँगा, चँदे की ईंक्वारी

देश का दिल दिल्ली मे आज बजी सहनाई
कहीँ मनायीँ गयी खुशियाँ, और कहीँ हुयी रुसवाई
जो भी सीटेँ पायी थी, ओ भी आज गवाँयी
ओवर कौन्फिडेँट ने आज, बीजेपी को है डुबाई


विनोद जेठुडी, 02/10/2015 @ 01:00 P.M  

Monday, 13 October 2014

दोस्त – शहिद वीर सिँह को भावभिनी श्रधाँजली



शहीदों की चिताओ पर लगेंगे हर बरस मेले
वतन पर मरने वाले का यही बाकि निशाँ होगा......

कभी समय था जब हम साथ मे स्कुल जाया करते थे
कभी समय था जब हम साथ मे ट्युसन पढा करते थे
कभी समय था जब हम साथ मे खेला करते थे.... और 
एक ओ भी समय था जब हम साथ मे भर्ती होने गये थे
ओ उस दिन भर्ती हो गया और हम बहार हो गये .......
ओ फौजी और हम विदेशी  बन गये ...................
मिलना जुलना नही हुआ सालो से, बस सोचते रह गये
मिलेंगे पुरसत से कभी, येसा ओ मुझसे कह गये
क्या सोचा योँ मिलेंगे कि सोचते रह गये
ओ देश सेवा के लिये, शहिद हो गये...
मिलने के ओ सपने, सपने रह गये  
तिरँगे मे बँद अंतिम दर्शन मैने भी कर लिये
दोस्ती की कसमो को कुछ योँ निभा गये
खट्टी - मिठ्ठी यादोँ के सहारे छोड गये
दोस्त तेरी अंतिम यात्रा मे भी हम आ न सके
श्रधांजली नम आखोँ से यही से दे गये ।
भारत माँ के बीर सपूत तुम बिन बोले चले गये
माता पिता सँग पत्नि और दो नन्ही बेटियाँ छोड गये ॥ 

विनोद जेठुडी

Thursday, 19 June 2014

समूण - कुछ हमारी कुछ तुम्हारी


समूण हँसी का
समूण खुशी का
समूण प्यार का
समूण दया का
समूण शिक्षा का
समूण सहयोग का
समूण मानवता का
समूण स्वास्थ्य का
समूण परोपकारिता का
............................
हमने तुमको दी थी खुशी जो
तुमने हमको दी थी हँसी ओ 
यादेँ उनकी रह जाती है......। 
समूण वही कहलाती है ॥ 

सर्वाधिकार सुरक्षित @ विनोद जेठुडी

Saturday, 31 May 2014

पक्षपात की परिभाषा

जिस प्रतिस्पर्धा में प्रतिभागी की प्रतिभा का परिणाम प्रतिभा के आधार पर न होकर बल्कि पूर्व से प्रमाणित हो, पक्षपात कहलाता है । 

विनोद जेठुडी, ३१ मई २०१४ @ १०:५० P.M

Saturday, 15 March 2014

कभी खुशी कभी गम




पहली ख़ुशी वह थी, जब उसके आने कि खबर मिली थी
मै भी खुश था ओ भी खुश थी, खुशी खूशी से झूम रही थी
सपने संजोकर सपने देखा, सपनो में एक फूल खिला था 
फूल के आने की खुशी में, घर आँगन सब खिल उठा था

बीते दिन और ओ दिन आया, जब आने का न्योता पाया

स्वागत की हुयी तैयारी, घर आँगन को खूब सजाया
सही सलामत वह यहां आया, खुशियाँ  बस पल भर की लाया
सगे-संबन्धी रिस्ते-नाते, सब के सब बधाईयाँ देते

कुछ ही पल में यों  हुआ कि, फूल मुरझाने लगा था

दवा-दुवाओं  के सहारे  ही,  बस जिए जा रहा था
उसने काफी हिम्मत कि थी, जीने का जो जोश भरा था
पर अठारवें दिन ओ हमको, अलविदा कह ही गया था

एक हवा के झोंके जैसे, आया था और चला गया

पल भर की खुशी दे के जीवन भर का गम दे गया
जाते जाते कुछ यों  हुवा कि दुखो का पहाड़ फिर टूट पड़ा
जो नन्हा दिल उसका खोला था, खुशी का भी खोलना पड़ा 

हर जीवन का लेख लिखा है, पर ऐसा  भी तो क्या लिखा ?

सारी दुनिया के दुखों को, क्या मुझको ही दे दिया ?
ऐसे  भी क्या कर्म किये थे जो येसी मुझको सजा दिया ?
बेटा-बीबी दोनों के ही, सीने को फाड़ दिया ?

मशीनो से ही, साँस लिया था, अपनी साँस न ले पाया
कहना चाहता था जो मुह से, वह  आँखों से कह गया 
बेटा मुझको माफ़ करना, मै  तूझको  बचा न पाया 
उस विधाता ने जो लिखा था, उसको न बदल पाया 

येसा  किसी को कभी न देना, जैसा तूने मुझे दिया 
तुझसे माँगा तूने दिया था, फिर वापस क्यों ले लिया 
आघे बस तू खुश रखना, जो हुवा सो हो गया 
हे ईश्वर तेरी आस्था ने, मुझको तो डगमगा दिया 

 विनोद जेठुडी 9 मार्च  2014 @ 6:55 AM

Saturday, 25 January 2014

चार दिन की चाँदनी

जीवन के हर पल को जी भर के जियो 
चार दिन की चाँदनी में रोशन रहो ……। 
जिंदगी का क्या पता, कब कैसा गम दे जाय ?
कि जीवन में फिर खुशी, नसीब ही न हो ॥ 


सर्वाधिकार सुरक्षित © विनोद जेठुडी
25  जनवरी, 2014 @ 7:45 A.M

शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ - 2022

 शिक्षा का दान करने वाले महान होते हैँ ।  शिक्षक के रुप मे वह, भगवान होते हैँ ॥  शिक्षक दिवस की सुभकामनाएँ